बाग़ सरदारन मंदिर🛕: सूजन सिंह हवेली से झलकती इतिहास की एक तस्वीर
- November 27, 2025
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रावलपिंडी के पुराने शहर की संकरी गलियों के बीच छिपा हुआ बाग़ सरदारन मंदिर (जिसे कुछ स्रोतों में रघुनाथ मंदिर परिसर या बाग़-ए-सरदारन भी कहा जाता है) आज
रावलपिंडी के पुराने शहर की संकरी गलियों के बीच छिपा हुआ बाग़ सरदारन मंदिर (जिसे कुछ स्रोतों में रघुनाथ मंदिर परिसर या बाग़-ए-सरदारन भी कहा जाता है) आज
रावलपिंडी के पुराने शहर की संकरी गलियों के बीच छिपा हुआ बाग़ सरदारन मंदिर (जिसे कुछ स्रोतों में रघुनाथ मंदिर परिसर या बाग़-ए-सरदारन भी कहा जाता है) आज एक स्थापत्य धरोहर होने के साथ-साथ यह चेतावनी भी देता है कि किस तरह सामुदायिक विरासत समय के साथ भुला दी जाती है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सूजन सिंह के उपक्रमों से जुड़े एक बड़े बाग़-हवेली परिसर के हिस्से के रूप में निर्मित इस स्थल में मूल रूप से कई हिंदू मंदिर और सिख गुरुद्वारे थे, और यह अंतर-धार्मिक सामाजिक जीवन का केंद्र माना जाता था। दशकों के दौरान — विशेषकर 1947 के विभाजन के बाद — यह परिसर उपेक्षा, अतिक्रमण और उपयोग में बदलाव के कारण धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होता गया।
स्थानीय इतिहास और उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार बाग़ सरदारन परिसर का निर्माण 1890 के दशक में हुआ था (आम तौर पर 1895–1897 का समय बताया जाता है)। ऐतिहासिक सारों के अनुसार, इसका निर्माण स्थानीय सिख सरदारों — जिनमें कुछ अभिलेखों में सरदार बंड सिंह और सरदार मिल्खा सिंह थेहपुरिया के नाम मिलते हैं — की देखरेख में हुआ। इसे जानबूझकर मंदिरों, गुरुद्वारों, बाग़ों और जन-कल्याण सुविधाओं वाले बहु-आयामी परिसर के रूप में तैयार किया गया था।
उस समय के वर्णन गुंबददार शिखरों, मुगल शैली की सजावट और ऐसे विन्यास का उल्लेख करते हैं जो इसे धार्मिक केंद्र के साथ-साथ सामाजिक-कल्याण के केंद्र के रूप में भी उपयोगी बनाता था।
बाग़ सरदारन का सूजन सिंह हवेली (जो राय बहादुर सूजन सिंह ने 1890 के दशक की शुरुआत में बनाई) के पास होना इस क्षेत्र की बहु-सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता था। पुराने (प्री-Partition) समय की तस्वीरों में मंदिरों के शिखर और गुंबद आसपास की गलियों के ऊपर उठते दिखते हैं — जो इस मोहल्ले के बहुधर्मीय अतीत की दृश्य याद दिलाते हैं।
स्थानीय शोधकर्ताओं और धरोहर लेखकों के अनुसार बाग़ सरदारन केवल पूजा का स्थल नहीं था; यह एक कल्याण केंद्र की तरह भी कार्य करता था जहाँ मुफ्त भोजन और सहायता वितरित की जाती थी। विस्तृत परिसर में बाग़, सार्वजनिक कुंड, सेवक-कक्ष और विभिन्न धर्मों के लोगों के लिए साझा सामुदायिक स्थल शामिल थे। यह इलाका कभी कई एकड़ में फैला था और विभाजन से पहले रावलपिंडी के सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
1947 के विभाजन से उत्पन्न बड़े पैमाने पर पलायन और हिंसा ने रावलपिंडी की जनसांख्यिकी को बदल दिया। कई हिंदू और सिख परिवार भारत चले गए; उनके धार्मिक स्थलों और संपत्तियों की देखरेख करने वाले बहुत कम बचे। आने वाले दशकों में बाग़ सरदारन परिसर का बड़ा हिस्सा निजी कब्जों, अनौपचारिक अतिक्रमण और विभिन्न उपयोगों में बदलने के कारण खो गया।
पाकिस्तानी मीडिया और धरोहर पर्यवेक्षकों की रिपोर्टों के अनुसार, मूल छह एकड़ का यह क्षेत्र अब कुछ मरलों तक सिमट गया है, और परिसर के कई हिस्सों को कार्यालयों, आवासों (कुछ रिपोर्टों में स्पेशल ब्रांच के उपयोग का उल्लेख), गोदामों या छोटे व्यावसायिक इकाइयों में बदल दिया गया है।
पिछले दशक की खबरें और प्रत्यक्ष रिपोर्टें इमारत की बिगड़ती स्थिति को दर्शाती हैं — फीकी भित्तिचित्र, टूटी प्लास्टर, टपकती छतें और बंद गलियारे। हालांकि गुंबद और शिखर अभी भी आसपास की छतों (विशेषकर सूजन सिंह हवेली से) से दिखाई देते हैं, परंतु अंदरूनी हिस्सों और आंगनों में लम्बी उपेक्षा के स्पष्ट निशान मौजूद हैं।
धरोहर विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने शहर के बढ़ते शहरी दबाव — जनसंख्या घनत्व, अनौपचारिक निर्माण और सीमित संसाधन — संरक्षण प्रयासों को और कठिन बना देते हैं।
बाग़ सरदारन का भविष्य समय-समय पर मीडिया और नागरिक समाज के अभियानों में चर्चा में आता रहा है। पत्रकारों और धरोहर कार्यकर्ताओं ने सरकार से मांग की है कि परिसर को संरक्षण कानूनों के तहत पंजीकृत किया जाए और उसे पाकिस्तान की बहुधार्मिक सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा माना जाए।
सरकारी एजेंसियों और इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) को अक्सर इन गैर-मुस्लिम संपत्तियों के संरक्षक के रूप में उल्लेखित किया जाता है, लेकिन बाग़ सरदारन के लिए ठोस और निरंतर पुनर्स्थापन कार्य बहुत धीमा रहा है — जैसा कि क्षेत्र के कई अन्य पूर्व-विभाजन स्थलों के साथ भी देखा जाता है।
कई समाचार रिपोर्टें, फोटो निबंध और विकिपीडिया पर संकलित सार बताते हैं कि यह परिसर कभी-कभी शोधकर्ताओं, फोटोग्राफरों और उत्सवों के दौरान प्रवासी सिखों और हिंदुओं द्वारा देखा जाता है। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानूनी सुरक्षा, पर्याप्त फंडिंग और व्यवस्थित संरक्षण योजना के बिना आगे की हानि को रोकना कठिन होगा।
बाग़ सरदारन की कहानी केवल स्थापत्य या पुरातात्विक नहीं है — यह साझा शहरी स्मृति, सह-अस्तित्व और यह समझने की कहानी है कि शहर अपने बहु-स्तरीय अतीत को किस प्रकार सँजोते हैं। यह परिसर मूल रूप से एक बहु-धार्मिक स्थल था जो धार्मिक, सामाजिक और परोपकारी गतिविधियों का केंद्र था — एक ऐसा नागरिक मॉडल जिसे आज के धरोहर विशेषज्ञ महत्वपूर्ण मानते हैं।
बाग़ सरदारन का संरक्षण रावलपिंडी के सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय संरक्षित करेगा और नागरिकों को अपने शहर की सांस्कृतिक परतों से जुड़ने का एक वास्तविक, भौतिक स्थान देगा।



